Guru Ghasi Das Jayanti (18 Dec.)

GURU_GHASI_DAS_BABA

Guru Ghasi Das ( 1756 – 1836 CE )[1] was an advocate of the Satnami sect of Hinduism in the early 19th century in state of Chhattisgarh. During his lifetime, the political atmosphere in India was one of exploitation. Ghasidas experienced the evils of the caste system at an early age, which helped him to understand the social dynamics in a caste-ridden society and reject social inequality. To find solutions, he travelled extensively across Chhattisgarh. Saint Guru Ghasidas established Satnami community in Chhattisgarh, India based on “Satnam” (meaning “Truth”) and equality. The Guru’s teachings and philosophy is similar to Hinduism & Buddhism. Guru Ghasidas created a symbol of truth called “jaitkhambh” – a white painted log of wood, with a white flag on the top. The structure indicates a white man who follows the truth “satnam” is always steadfast and is the pillar of truth (satya ka stambh). The white flag indicates peace. (source: https://en.wikipedia.org/wiki/Ghasidas)

Teachings:

Quotes:

Speaking on the occasion, the President said that Guru Ghasidas was a remarkable social reformer among the dispersed community of this region almost 200 years ago. He struggled against social evils and injustice, and fought for the poor and downtrodden. His message was simple: that truth and noble conduct are synonyms for God. He made efforts to eliminate the practice of untouchability, and emphasised fraternity and social harmony. He also stressed women’s rights and supported widow marriage. (http://www.internationalnewsandviews.com/the-teachings-of-guru-ghasidas-have-given-direction-to-social-reform-president/)

उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत निम्नलिखित है:-

 ऽ सत्य ही ईश्वर है और उसका सत्याचारण ही सच्चा जीवन है।
ऽ सत्य का अन्वेषण और प्राप्ति गृहस्थ आश्रम में सत्य के मार्ग में चलकर भी किया जा सकता है।
ऽ ईश्वर निर्गुण, निराकार और निर्विकार है। वह सतनाम है। वह शुद्ध, सात्विक, निश्छल, निष्कपट, सर्व शक्तिमान और सर्व व्याप्त है।
ऽ सत्य के रास्ते में चलकर और शुद्ध मन से भक्ति करके ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।
ऽ धर्म का सार अहिंसा, प्रेम, परोपकार, एकता, समानता और सभी धर्मो के प्रति सद्भाव रखना है।
ऽ अहिंसा एक जीवन दर्शन है, दया एक मानव धर्म है। संयम, त्याग और परोपकार सतनाम धर्म है।
ऽ गुरू घासीदास ने सतनाम का जो दार्शनिक सिद्धांत दिया वह निरंतर अनुभूति के तत्व दर्शन पर आधारित है। वह उनकी आजीवन तपस्या, चिंतन, मनन और साधना का प्रतिफल है। यह उनके अलौकिक ज्ञान तथा दिव्य अनुभूति पर आधारित है।
उन्होंने न केवल छतीसगढ को एकरूपता प्रदान की बल्कि एक संस्कृति और एक जीवन दर्शन दिया। उनका उपदेश सम्पूर्ण मानवता के लिये कल्याणकारी है। जो निम्नानुसार है:-
1. दया, अहिंसा के रूप में ईश्वर तक पहुंचने का साधन है।
2. मांस तथा नशीली वस्तुओं का सेवन पाप है। यह हमें ईश्वर तक नहीं पहुंचने देता और दिग्भ्रमित कर देता
है।
3. सभी धर्मो के प्रति समभाव तथा सहिष्णुता रखना चाहिये। सभी धर्मो का लक्ष्य एक ही है।
4. जाति भेद, ऊंच नीच और छुआछूत का भेदभाव ईश्वर तक पहुंचने में व्यवधान उत्पन्न करता है।
5. मानवता की पूजा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। दलितों और पीड़ितों की सेवा ही ईश्वर की सच्ची भक्ति है और मानवता की आराधना ही सच्चा कर्मयोग है।
..अपने विचारों को गुरू घासीदास ने सात सूत्रों में बांधा है जो सतनाम पंथ के प्रमुख सिद्धांत है:-
 
सतनाम पर विश्वास रखो
मूर्ति पूजा मत करो
जाति भेद के प्रपंच में मत पड़ो
मांसाहार मत करो
शराब मत पीयो
परस्त्री को मां-बहन समझो।
निःसंदेह गुरू घासीदास के सतनाम के द्वारा भारतीय समाज को एक व्यावहारिक दर्शन का ज्ञान कराकर भारतीय संस्कृति को सुदृढ़ बनाया है। इस पंथ के लोगों द्वारा अक्सर गाया जाता है:-
हिंदू हिंसा जर छुआछूत माने हो,
पथरा ला पूज पूज कछु नई पावे हो
कांस पीतल ला भैया मूरचा खाही हो
लकड़ी कठवा ल घुना खाही हो
सब्बो घट म सतनाम हर समाही हो
गुरू घासीदास मन के भूत ल भगाही हो।
जीव बलिदान ला गुरू बंद करावे हो
सत्यनाम टेरत राखे रहियो मन में
माटी के पिंजरा ला परख ले तोर मन में
यह माटी तन म समाही हो
यह मानुष तन बहुरि नई आही हो
गुरू घासीदास कह सुन ले गोहार हो
सतनाम भज के तोर हंसा ल उतार हो
संत समाज म मन ल लगाइ ले
निरख निरख के भक्ति जगाइ ले।
(Source: http://www.sahityashilpi.com/2010/12/18.html)

Further study:

Life History of Sant Ghasi Das

Satnami

Songs

 

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